Hi.... मेरा नाम पाकस श्रीवास्तव है। ये तो आप जानते ही हैं फिर पता नहीं क्यों बता रहा हूँ। खैर ''पता'' एक ऐसी चीज है जिसके बारे में सभी को पता है लेकिन फिर भी किसी को नहीं पता कि आखिर मुझे पता है भी या नहीं। मैं पिछले साल अक्टूबर में पटना गया था। काफी अच्छा शहर है। जब मैं वापस आ रहा था तो मुझे ट्रेन में एक अंकल मिले......नाम था संजय। बाकी आगे का मैने पूछा भी नहीं क्योंकि उसकी कोई जरुरत ही नहीं थी।
मेरी ट्रेन लगभग १० घंटे लेट थी। पटना स्टेशन पर सबह ४ बजे से बैठे-बैठे दिमाग ख़राब हो गया था। एक तो बिना नहाये तो और ख़राब लग रहा था। मैं तो सुबह ३ बजे ही स्टेशन पर आ गया था और माता जी आई थीं लगभग ११ बजे। खैर इंतज़ार ही मज़ा ही कुछ अलग होता है। हज़ार तरीके के लोगों को देखने और मिलने का मौका मिलता है। खैर ट्रेन आई और मैं चढ़ते ही अपनी ही सीट पर सो गया। ३ घंटे बाद उठा मैं सो कर। ट्रेन बिहार पार कर चुकी थी और आउटर पर ही १ घंटे से रुकी थी। शाम के लगभग ३ बजे होंगे जब हम लोगों की बातचीत शुरू हुई। उस समय हमारे एरिया की ८ सीटों में ९ लोग थे। उनमे से एक बच्चा था ५ साल का शायद , तो बाकि हम ८ लोगों में किसी अंधविश्वास को लेकर बातें शुरू हुई थीं ..... अब वो क्या था ये मुझे नहीं याद है। लेकिन उन लोगों के बारे जरूर याद है। वैसे ऐसे समय आस-पास के भी लोग अपने-आप ही आप की बातों में मज़े से मज़े लेते हैं। खैर हम सभी की बातें इधर-उधर से घुमते-घामते प्यारे भगवान जी पर आ गई.. भगवान ऐसे हैं, भगवान वैसे हैं, भगवान खाना खाते हैं, भगवान खाना नहीं खाते हैं, भगवान सोते हैं की नहीं ऐसी ही फालतू बातों पर हम सभी बकवास कर रहे थे। मैं लिए नहीं लिख रहा की हम में से किसने क्या कहा, क्यों कहा , या फिर क्या क्या बकवास की। इतनी सारी बातें हुई थीं........ कोई कह रहा था कि भगवान है तो कोई कह रहा था कि भगवान घोड़े बेच कर सो भी जाता है। खैर इतनी सारी बातों में मुझे जो सबसे ज्यादा पसंद आया और अभी तक याद है वो संजय अंकल ने मुझसे बोला था कि........ एक बार एक कुम्हार जो धर्म, जाति और बाकि ऐसे ही सारे आडम्बरों से थक चुका था। एक दिन उसने भगवान से यूँ ही मज़ाक-मज़ाक में काफी मज़ेदार अंदाज़ में बात बोली कि......
"हे भगवान. तू भी कलाकार, मैं भी कलाकार ,मेरी ट्रेन लगभग १० घंटे लेट थी। पटना स्टेशन पर सबह ४ बजे से बैठे-बैठे दिमाग ख़राब हो गया था। एक तो बिना नहाये तो और ख़राब लग रहा था। मैं तो सुबह ३ बजे ही स्टेशन पर आ गया था और माता जी आई थीं लगभग ११ बजे। खैर इंतज़ार ही मज़ा ही कुछ अलग होता है। हज़ार तरीके के लोगों को देखने और मिलने का मौका मिलता है। खैर ट्रेन आई और मैं चढ़ते ही अपनी ही सीट पर सो गया। ३ घंटे बाद उठा मैं सो कर। ट्रेन बिहार पार कर चुकी थी और आउटर पर ही १ घंटे से रुकी थी। शाम के लगभग ३ बजे होंगे जब हम लोगों की बातचीत शुरू हुई। उस समय हमारे एरिया की ८ सीटों में ९ लोग थे। उनमे से एक बच्चा था ५ साल का शायद , तो बाकि हम ८ लोगों में किसी अंधविश्वास को लेकर बातें शुरू हुई थीं ..... अब वो क्या था ये मुझे नहीं याद है। लेकिन उन लोगों के बारे जरूर याद है। वैसे ऐसे समय आस-पास के भी लोग अपने-आप ही आप की बातों में मज़े से मज़े लेते हैं। खैर हम सभी की बातें इधर-उधर से घुमते-घामते प्यारे भगवान जी पर आ गई.. भगवान ऐसे हैं, भगवान वैसे हैं, भगवान खाना खाते हैं, भगवान खाना नहीं खाते हैं, भगवान सोते हैं की नहीं ऐसी ही फालतू बातों पर हम सभी बकवास कर रहे थे। मैं लिए नहीं लिख रहा की हम में से किसने क्या कहा, क्यों कहा , या फिर क्या क्या बकवास की। इतनी सारी बातें हुई थीं........ कोई कह रहा था कि भगवान है तो कोई कह रहा था कि भगवान घोड़े बेच कर सो भी जाता है। खैर इतनी सारी बातों में मुझे जो सबसे ज्यादा पसंद आया और अभी तक याद है वो संजय अंकल ने मुझसे बोला था कि........ एक बार एक कुम्हार जो धर्म, जाति और बाकि ऐसे ही सारे आडम्बरों से थक चुका था। एक दिन उसने भगवान से यूँ ही मज़ाक-मज़ाक में काफी मज़ेदार अंदाज़ में बात बोली कि......
तूने मुझ जैसे पुतले असंख्य बनाकर धरती पर हैं भेजे
और मैंने तुझ जैसे पुतले असंख्य बनाकर इसी धरती पर हैं बेचे।
शर्म तो तब आती है, जब तेरे बनाये पुतले आपस में लड़ते-झगड़ते हैं।
गर्व तो तब महसूस होता है,
जब मेरे बनाये पुतले के सामने तेरे पुतले शीश नवा कर चले जाते हैं। "
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ReplyDeleteA great writer has started
ReplyDeleteThank you bhai.
ReplyDeleteबेहतरीन अभिब्यक्ति
ReplyDeleteThank you bhai
ReplyDeleteGood story... Nice to see you start writing... still has a long way to go... All the best..
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