Wednesday, 27 December 2023

त्रिकोण

भाग - 2 



वैसे तो मैं उस कार के बारे में ही सोच रहा था, लेकिन सोचा कि हो जाता है कभी-कभी ऐसा। मैं घर वापस आ गया हालांकि बिना चालक की उस कार को भूल नहीं पाया। हाथ में चोट भी लग गई थी जिसे देखकर मम्मी ने पूछा, जब मैंने उन्हें सारी बात बताई तो वो काफी डर गईं। वो बहुत ज्यादा पूजा पाठ करती थीं तो पता नहीं कहाँ से एक रुद्राक्ष लाकर मुझे पहना दिया। बस मैंने उन्हें कार में किसी के न होने की बात नहीं बताई। कुछ दिनों बाद मुझे अपने एडमीशन के लिए दिल्ली जाना पड़ा। काॅलेज में एडमीशन करवा कर वापस आने के लिए जब मैं ट्रेन पर चढ़ने लगा, तो मुझे लगा कि किसी ने मेरा पैर पकड़ कर खींच लिया हो, मैं जमीन पर गिर पड़ा। लेकिन गाड़ी रुकी होने की वजह से मुझे ज्यादा चोट तो नहीं लगी। लेकिन मैं सोच में पड़ गया कि मेरा पैर किसने खींचा। मैंने इधर-उधर देखा भी लेकिन कोई दिखाई नहीं दिया। मैंने सोचा कि मैं ही गलत तरीके से चढ़ रहा होउंगा इसीलिए गिर गया। मैं उठकर दोबारा चढ़ गया। मैं घर तो आ गया लेकिन इस बार का गिरना मुझे काफी अज़ीब लग रहा था। 

                    जब मैं घर आया तो मम्मी ने मुझे बताया कि भाभी की तबियत ( कुछ दिनों से )ज्यादा खराब है। मैं रात में घर पहुंचा था और खाना खाकर सो गया। थका हुआ था तो सुबह देर तक सोता रहा। जब मैं उठा तो 11 बज चुके थे, काफी देर हो गई थी और भाभी को डाॅक्टर के पास भी ले जाना था। मैं जल्दी से उठा और नहा-धोकर तैयार हो गया। भाभी को लेकर जब मैं चलने लगा तो पता नहीं क्यों उन्होंने मना कर दिया! लेकिन काफी समझाने के बाद वो चलने के लिए तैयार हो गईं। डाॅक्टर ने काफी जाँच करने के बाद मामूली पेट दर्द की बात बताई। मैं भाभी को लेकर वापस आ रहा था तो मुझे काफी अजीब लग रहा था। सच बताऊं तो मुझे बाईक बहुत भारी लग रही थी, और काफी डर भी लग रहा था। घर वापस आने के बाद भाभी सीधे अपने कमरे में चली गईं। उन्होंने दोपहर में खाना भी नहीं खाया। 

लगभग तीन या चार दिन बाद मैं मार्निंग वाक के लिए जा रहा था। अभी कुछ दूर ही गया था कि बिजली के खंभे से एक तार टूट कर अचानक से मेरे सामने आ गया (गिर गया)। मैं सही-सलामत था, क्योंकि वो तार मुझसे सिर्फ कुछ इंच की दूरी पर गिरा था। मैं काफी ज्यादा डर गया था और वापस चला आया। घर में घुसते ही सामने मम्मी मिल गईं और पूछने लगीं कि आज जल्दी क्यों चला आया तू? मैंने भी नींद का बहाना बना दिया। मैं अपने कमरे में जा ही रहा था कि अचानक सामने भाभी मिल गईं। पता नहीं क्यों वो मुझे देखकर मुस्कुरा रही थीं। भईया के जाने के बाद भाभी बहुत कम ही हँसती थीं लेकिन आज मुझे कुछ अटपटा सा लगा। पता नहीं क्यों लेकिन भाभी का मुस्कुराना मुझे अच्छा नहीं लगा। मैं भी हल्के से मुस्कुरा दिया और अपने कमरे में चला गया। 

                  मैं जब नहा रहा था तो बार-बार भाभी की वो हँसी याद आ रही थी। मैं नहा-धोकर जब नाश्ता करने बैठा तो सैंडविच देते समय गलती से मेरा हाथ भाभी के हाथ से छू गया। उन्होंने अपना हाथ जल्दी से खींच लिया जैसे करंट लग गया हो। उनका हाथ काफी गर्म भी था। मैंने उनसे पूछा भी लेकिन उन्होंने यह कहते हुए बात टाल दिया कि अभी किचन में थी तो शायद गैस की आँच की गर्मी है। मैंने सोचा कि आँच से हाथ इतने गर्म कैसे हो सकते हैं! मैंने जल्दी से नाश्ता किया और आकाश के पास जाने के लिए तैयार होने लगा। मैं आकाश के घर से लौट रहा था तो पता नहीं क्यों आज मंदिर जाने का मन कर रहा था। मैं मंदिर से दर्शन करके लौट रहा था कि सीढ़ियों पर ही एक बाबा जी मिल गए। मैंने बाबा जी के पैर छुए, उनसे प्रसाद लिया और वापस आने के लिए मुड़ा। दो-चार सीढ़ी उतरते ही पीछे से किसी ने आवाज दी। मैंने पीछे देखा लेकिन अनजाने चेहरे देखकर मैं फिर वापस आने लगा। तभी बाबा जी ने आवाज लगाई और कहने लगे कि तुम्हें मैंने ही बुलाया है। मैंने भी पूछा,‘‘जी बताइए कोई गलती हो गई क्या मुझसे?’’ पहले तो ऐसा लगा कि वो कुछ सोच रहे हैं। फिर उन्होंने कहा कि शायद हाँ भी और शायद ना भी। मैंने पूछा,‘‘ बाबा मैं कुछ समझा नहीं, जरा खुलकर बताइए।’’ उन्होंने मुझसे यह भी पूछा कि आज तुम्हारी मोटरसाइकल भारी तो नहीं लग रही है। मैंने भी हैरत में पूछ लिया कि, बाबा मैं कुछ समझा नहीं। बाबा ने पहले तो मेरी बात को टाल दिया और बोले कि कुछ नहीं। फिर हाथ में पकड़ी हुई पूजा की थाली से एक पीले रंग का फूल उठाया और उसमें फूंक कर मुझे दे दिया।   मैने भी उसे अपनी जेब में रख लिया। साथ ही उन्होंने यह भी कहाकि जब डर लगे उसके सामने जला देना। मैंने भी उसे लेकर जेब में रख लिया। घर लौटकर मैंने कपड़े बदले और सो गया। 

Thursday, 12 October 2023

त्रिकोण

भाग - 1




MULTIDIMENSION अर्थात बहुआयाम। मतलब इस ब्रह्माण्ड में एक से ज्यादा आयाम मौजूद हैं और सभी एक दूसरे से बस थोड़े से ही अलग हैं। सनातन धर्म तो हमेशा से ही इस बारे में कहता आया है और अब हॉलीवुड की एवेंजर्स मूवी में भी इस बारे में बात की गई है। इन सभी में हम मौजूद तो हैं, लेकिन सभी में थोड़ा-थोड़ा फर्क जरूर है। कुछ ऐसा ही हमारे रूद्र के साथ भी है,  आज आपको एक और रूद्र के बारे में बताने जा रहा हूँ। जो मौजूद तो हर एक आयाम में है, लेकिन उसकी बुरी किस्मत हर जगह पीछे पड़ी हुई है। चलिए अब अपने बारे में रूद्र खुद ही आप को बताएगा कि आखिर इस आयाम में उसके साथ हुआ क्या है! 

     आगे की कहानी रूद्र की जुबानी.......... 


मेरा नाम रूद्र है। आज मैं 65 साल का हो गया हूँ। मतलब मेरा पैसठवां जन्मदिन है। मेरे बच्चे और नाती-पोते सभी तैयारी तो कर रहे हैं। लेकिन अब वो इतनी खुशी से नहीं मनाते हैं। बस मेरी फोटो पर माला चढ़ा दी है और सामने बस शान्त बैठे हुए हैं। क्योंकि अब मैं उनके साथ नहीं हूं। जी हाँ आज से 30 साल पहले एक कार दुर्घटना में मेरी मौत हो चुकी है। लेकिन आज भी वह दिन मेरी यादों में ताजा है।

जब मैं पैदा हुआ था तो घर के सभी लोग बहुत खुश थे कि अब छोटू का जन्मदिन पूरा देश मनाएगा। घर में सब मुझे छोटू कहते थे। भाई, पापा, दीदी, मम्मी सभी बहुत प्यार करते थे। फिर स्कूल और उसके बाद काॅलेज गया। मैंने शहर के ही एक प्रतिष्ठित डिग्री काॅलेज से पढ़ाई करके बैचलर डिग्री प्राप्त कर ली थी। मैं बहुत खुश था क्योंकि कुछ ही दिनों में मेरे भाई की शादी होने वाली थी। भाई की शादी बहुत धूमधाम से हुई, मैं सारी रात भईया और भाभी के साथ जश्न मनाता रहा। शादी के एक हफ्ते बाद ही 15 अगस्त था, मेरा 25वाँ जन्मदिन। सुबह उठते ही सभी ने मुझे बधाईयाँ और आशीर्वाद दिए। मैं जब नहा कर नाश्ता करने बैठा तब भाई ने मुझे एक छोटा सा डिब्बा दिया। मैंने सोचा कि भाई ने मुझे मेरी पसंदीदा घड़ी गिफ्ट की है। लेकिन जब मैंने वो डिब्बा खोला तो उसमें मेरी उम्मीदों से बढ़कर था.....चाभियों का जोड़ा। मैंने सोचा कि भाई मेरे लिए मेरी पसंदीदा बाईक लाए हैं। लेकिन जब मैं दौड़कर बाहर गया तो मेरी हवाईयाँ उड़ गईं। क्योंकि मेरे सामने मेरे पसंदीदा रंग की मारुति स्विफ्ट कार खड़ी थी। तभी भाई ने पीछे से आकर कान में धीरे से कहा, ‘ये तेरे ही लिए है छोटू’। मैं तो खुशी से उछल ही पड़ा। शाम हुई मैंने केक काटा फिर भाई और कुछ दोस्तों के साथ पार्टी करने के लिए निकल गया। 

पार्टी करके हम घर वापस आ ही रहे थे कि 2-3 कि.मी. पहले एक बेकाबू ट्रक ने हमारी कार में पीछे से टक्कर मार दी। हमारी कार हवा में काफी ऊपर उछली और फिर औंधे मुँह जमीन पर गिर गई। जिससे मेरा सिर कार की छत से तेजी से टकराया। मेरे सिर से खून निकलने लगा और मैं बेहोश हो गया। थोड़ी देर बाद मुझे होश आया लेकिन मुझे सिर्फ जमीन पर खून फैला दिखा और कुछ लोगों की आवाजें सुनाई दे रही थीं। मैं फिर बेहोश हो गया। अब मेरी आँख खुली तो खुद को हाॅस्पिटल में पाया। मेरे सिर में बहुत तेज दर्द हो रहा था। लेकिन, सामने मम्मी, पापा को देखकर काफी आराम मिला। डाॅक्टर ने मुझे नींद की दवा का इंजेक्शन लगाकर सुला दिया। मैं शायद 24 घंटे से ज्यादा नींद में रहा। तीन दिन बाद मुझे बताया गया कि उस हादसे में कार के शीशे का एक बड़ा टुकड़ा भाई के सिर में घुस गया था। जिससे वहीं भाई की मौत हो गई थी। मैं बहुत रोया लेकिन डाॅक्टर ने फिर मुझे नींद का इंजेक्शन लगा दिया और मैं सो गया। 10 दिन बाद मैं डिस्चार्ज होकर घर लौट आया। मैं ठीक से चल नहीं पा रहा था। क्योंकि मेरे पैर की हड्डी टूट गई और डाॅक्टर ने पैर में राॅड डाल दी थी। इस दौरान भाभी ने इसे अपनी नियति मानते हुए मेरी बहुत देखभाल की। 

              भाई की मौत का जिम्मेदार मैं ही था। न मैं कहता, न ही हम बाहर पार्टी करने जाते और न ये हादसा होता। एक दिन मैं रोते-रोते खुद को कोस रहा था कि मेरी वजह से ही मेरी भाभी विधवा हो गईं। शायद भाभी ने मुझे देख लिया था, वो मेरे पास आईं और डांट कर शांत करा दिया। मैं शांत तो हो गया, लेकिन भाई की याद बहुत आ रही थी। थोड़ी देर बाद मेरी दवाई का समय हो गया। मम्मी ने दवा दी और मैं सो गया। कुछ ही दिनों में मैं पूरी तरह ठीक हो गया। बिना किसी सहारे के चलने फिरने भी लगा। कुछ दिनों बाद मैंने भईया की बाईक निकाली और उसे साफ करने लगा। सच बताऊँ तो काफी दिन से घर में पड़ा-पड़ा मैं बोर हो गया था तो सोचा आज दोस्तों से ही मिल आऊँ। दोपहर के तीन बज रहे थे और शायद मैं हर्ष के घर से लौट रहा था। जब मैं शहर के एक प्रतिष्ठित माॅल के सामने से गुजर रहा था कि अचानक से एक कार बैक हुई और मुझसे टकरा गई। मैं जमीन पर गिर गया, बस थोड़ी सी खरोंच आई। मैं और कुछ राहगीर उस कार वाले को डाँटने के लिए बढ़े लेकिन उस कार में तो कोई था ही नहीं।


                                                                                     क्रमशः ............

Monday, 12 December 2022

तेरी यादों की कैद


 

अंतिम भाग 

आखिरी बार जब रूद्र ने शुष्मि को देखा था तब से आज चार साल बीत चुके हैं। दोनों के बीच एक मैसेज तक नहीं हुआ है। यहां तक कि दोनों को यह भी नहीं पता कि वे हैं कहां आजकल। 

 वैसे इतने समय में शुष्मि कैसी है यह तो नहीं पता, लेकिन रूद्र बहुत ही बदल गया है। पहले सिर्फ लोअर और टीशर्ट में रहने वाला लड़का अब जींस पहनने लगा है। यहां तक कि  फॉर्मल कपड़े पहन कर ही काम के लोगों से मिलता था। वैसे शुष्मि से अलग होने के बाद से रूद्र ने खुद को सिर्फ काम में ही झोंक दिया। उम्र के साथ ही रूद्र ज्यादा परिपक्व भी होता जा रहा था। इस बात का अंदाजा तो उसके परिवार ने लगा ही लिया था और अब वो उसकी शादी की भी बात सोचने लगे। लेकिन, रूद्र लगातार इंकार कर देता है। 

   सालों से लगातार अपने काम में मशगूल रूद्र रोज की तरह ही आज भी अपनी पसंदीदा लाल रंग की बाइक से ऑफिस के लिए निकला, हालांकि चौराहे की लाल लाइट की वजह से उसे रुकना पड़ा। अब इसे इत्तेफाक कहें या भगवान की प्लानिंग, बाइक के ठीक बगल में आकर एक कार रुकी। जिसकी बाईं खिड़की से चूड़ियों वाले हाथ निकले हुए थे। साथ ही उस हाथ के नाखुनों में नीली साड़ी से मैच करते हुए नेवी ब्लू व पिंक की मिक्स नेलपॉलिश लगी हुई थी। जिसे देखते ही रूद्र को किसी की याद आ गई। इस याद के चक्कर में उसे पता भी नहीं चला कि कब ट्रैफिक लाइट हरी हो गई। हालांकि पीछे से आ रहे हॉर्न की आवाजों ने उसे अहसास करवा दिया कि भाईसाहब जाग जाओ। 
 
 ख्यालों से बाहर आते ही रूद्र ने तेजी से अपनी बाइक दौड़ा दी और सीधे अपने दोस्त के ऑफिस के बाहर रुका। रुक कर उसके हेलमेट उतारते ही वहां कार से कुछ लोग उतर कर रूद्र के सामने हाथ जोड़ रहे थे तो कुछ हाथ मिला रहे थे। यह सब कुछ दूर से कोई देख रहा था, कार वही थी और साड़ी व नेलपॉलिश भी वही थी जो थोड़ी देर पहले लाल रंग की लाइट के पास थी। उन दोनों आँखों ने पहचान लिया था कि यह रूद्र ही है, लेकिन इतने सारे लोग उसके सामने हाथ क्यों जोड़े हुए हैं। इन्हीं सब बातों को सोचते हुए उन खूबसूरत हाथों ने अपना मोबाइल निकला और कान से लगा लिया, साथ ही यह भी बोली कि " यह हमेशा से यह अखड़ू " है। 
 
 इस बात को 48 घंटे से ज्यादा बीत चुके थे, कि करीब रात के 9 बजे जब रूद्र अपने लैपटॉप पर काम कर रहा था तब उसका फोन बजा।  फोन की स्क्रीन देखकर वह मुस्कुराया और फिर कट करके अपने काम में लग गया। साथ ही यह भी जान लीजिये कि उस रात काम करने के बाद रूद्र ने काफी रात तक शराब पी। हालांकि बावजूद इसके वो सुबह जल्दी उठकर अपने काम के लिए चला गया। ऑफिस पहुंच कर जब उसने अपना फोन देखा तो एक मैसेज पढ़ा, जिसमें लिखा था कि ' कुछ ज्यादा ही बिजी हो गए हो, बहुत बदल गए हो '। इसके रिप्लाई में रूद्र ने लिखा कि " वक़्त सब कुछ बदल देता है, मैं तो फिर भी इंसान हूं "। बस इस बात की वजह से ही शुष्मि को गुस्सा आ गई और फिर दोनों के बीच कई दिनों तक वार्तालाप ( मैसेज पर ) हुई।
  
  भले ही शुष्मि और रूद्र के बीच बातें हुईं लेकिन,  अब हमारे लड़के को थोड़ा अटपटा लगने लगा था। क्योंकि उसे पता था कि इसका कोई मतलब नहीं है।  अब शादी के बाद वो किसी और की अमानत है, ऐसे में प्यार भले कितना भी हो, किसी की इज्जत का ख्याल पहले रखना चाहिए और इसीलिए रूद्र ने उन बातों पर फुल स्टॉप लगा दिया।

 फिर भी उसके मन में एक ही बात चल रही थी, 
 
                                   " मेरी हर दुआ में रहने वाला शख्स 
                                        किसी को बिन मांगे मिल गया।"

 इस आखिरी बात को भी 20 दिन गुजर चुके थे। आपको बता दें कि भले ही रूद्र ने बात करना बंद कर दिया था, लेकिन उसने सभी बातों को रिकॉर्ड कर लिया था और रोज लूप में सुनता था। ऐसे ही एक दिन वो अपने काम से शहर से बाहर जा रहा था, हाइवे पर था, शुष्मि की आवाज सुन रहा था और 100 की स्पीड की बाइक चलाए जा रहा था। अभी कुछ 15-20 मिनट ही  गुजरे थे कि एक कार तेजी से बगल से निकली, यहां तक कि कार की वजह से रूद्र की बाइक थोड़ी लड़खड़ा सी गई। इसके बाद रूद्र के मुँह से निकला कि ' कितने चूतिया लोग हैं, ऐसों की वजह से ही एक्सीडेंट होते हैं। ' वो गुस्से में कार को  बढ़ते हुए देख रहा था। अभी मुश्किल से आधा किलोमीटर ही आगे बढ़े होंगे कि दूसरी तरफ से आ रही एक ट्रक का आगे का पहिया अचानक से फट गया और डिवाइडर तोड़ते हुए इस तरफ तेजी से आई और उस कार से टकरा गई। यह घटना इतनी तेजी से घटी कि रूद्र अवाक रह गया। वो तेजी से बाइक भगा कर एक्सीडेंट वाली जगह पहुंचा। 
    
                                        हादसा देख कर उसकी आंखों से सिर्फ आंसू ही निकल रहे थे, क्योंकि कार की कंडक्टर वाला दरवाजा खुला था और एक शादी शुदा लड़की खून से लथपथ बाहर की ओर झुकी हुई थी। रूद्र ने उसे बाहर निकाला और गोद में लेकर बस देखे और रोए ही जा रहा था। दरअसल वो लड़की कोईऔर नहीं बल्कि शुष्मि ही थी और जब रूद्र ने उसे गोद में लिया तब उसकी ऑंखें खुलीं और  शुष्मि ने उसे देखकर मुस्कुराते हुए कहा " आ गए, तो तुम मेरा पीछा नहीं छोड़ोगे " और फिर हमेशा के लिए शांत हो गई। 

          रूद्र के मन में तो बस यही चल रहा था था, 

               " कौन छुड़ाना चाहता है पीछा तुझसे और तेरी यादों से, 
                                    
                       ये तो वो कैद है जो जान से ज्यादा अजीज है। "

Thursday, 4 March 2021

अब नहीं



पार्ट 2 

उस दिन रूद्र और शुष्मि के बीच बस इतनी ही बात हो पाई। हाँ दोनों एक दूसरे से बहुत बात करना चाहते थे, बावजूद इसके उन्होंने बात नहीं की। रूद्र दूर से shushmi को डांस करते हुए और सेल्फी लेते हुए देखता रहा। कुछ ऐसा ही शुष्मि भी कर रही थी। वो सेल्फी लेना हो या डांस करना, shushmi ने कई बार उसे तिरछी नजरों से देखा था। और ये बात रूद्र को पता थी। जो उसे बहुत रोमांचित कर रही थी। लेकिन, चाह कर भी वो शुष्मि के पास नहीं जा सकता था। काम खत्म होने के बाद वो शुष्मि को गेट तक छोड़ने भी आया था और भरे मन से उसे जाते हुए भी देखा था। इसके बाद रूद्र फिर अपने काम में लग गया। 

       रूद्र बहुत थका हुआ था तो अगले दिन वो देर से सो कर था। शाम के 6 बजे वो नहाया और 7 बजे अपने काम से निकल गया। रात 10 बजे वो घर लौटा। उसके लेते हुए बस 5 मिनट ही हुए थे कि एक मैसेज आया ' क्या हम बात कर सकते हैं '। रूद्र ने भी रिप्लाई किया कि 10:30 के बाद। फिर एक मैसेज आया ' जब फ्री होना बता देना '।  वैसे रूद्र का मन तो कर रहा था कि अभी फ़ोन कर दे। लेकिन, उसका शरीर टूट रहा था। खैर उसने ठीक 10:30 पर उस नंबर पर कॉल कर दी। 

उधर से पहली आवाज आई - कैसे हो ? 

 रूद्र - मस्त, आप कैसे हो। 

शुष्मि - क्या कर रहे थे ?

रूद्र - आपकी आवाज सुनने का इंतजार। 

शुष्मि - कुत्ते हो तुम, मुझे तुमसे बात ही नहीं करनी।

रूद्र - क्या हुआ गुस्से में क्यों हो ?

शुष्मि - तुमने कल मुझसे बात तक नहीं की, इतना एटीट्यूड।

रूद्र - बात तो हुई थी, हम दोनों 

रूद्र बस इतना ही बोल पाया कि शुष्मि ने बीच में ही उसे टोक दिया। 

शुष्मि -  इसे तुम बात करना कहते हो। कल मेरे साथ तुम डांस कर सकते थे। मेरे साथ एक फोटो खींच सकते थे।               हम दोनों की कम से कम एक फोटो तो हो ही सकती थी। वो सब गधों ने फोटो खिंचवाई, तुमने देखा भी नहीं मेरी तरफ। लेकिन, तुम लड़के हो ना, क्यों आओगे तुम। 

 ये सब सुनकर रूद्र  सिर्फ हंस रहा था। क्योंकि वो नहीं जानता था कि शुष्मि उसके बारे में क्या सोचती है। 

रूद्र - तुम्हारा मन था तो तुम मुझे बोल देती। हर बात के लिए डांटती हो, उस वक़्त भी डांट देती और घसीट ले जाती अपने साथ। यार मैं काम में लगा हुआ था, वो जरुरी था ना। 

शुष्मि - अपनी गलती मानोगे नहीं। अच्छा सच बताओ तुम्हारा मन नहीं था मेरे साथ डांस करने का। 

रूद्र - मेरा तो बहुत मन था, लेकिन तुम्हारे पास वो जो गधे खड़े थे ना वो मुझे बिलकुल भी नहीं पसंद और वो काम भी बहुत जरुरी था। तो मैंने मन को मारना ही जरुरी समझा। 

शुष्मि - अच्छा एक बात बताओ कोई गर्लफ्रैंड है। 

रूद्र - नहीं 

शुष्मि - अबे इतना समय बीत चुका है, बूढ़े होते जा रहे हो और गर्लफ्रैंड नहीं कोई। 

रूद्र - हां, नहीं है। तुम्हारे अलावा कभी कोई दिल में नहीं उतरा।

shushmi - कुछ साल पहले मैं रिलेशनशिप में थी।  

roodra - मुझे तुमसे मतलब है, तुम्हारे पास्ट से नहीं। हाँ ये अलग बात है कि मैं तुमसे पास्ट टेंस से प्यार करता हूं। 

शुष्मि - ऐसी बातें कहां से सीखते हो। 

रूद्र - तुम्हें देखकर।

  दोनों अपनी पुरानी यादों को ताजा करते रहे और एक दूसरे को चिढ़ाते रहे। इस तरह से रात करीब तीन बजे तक दोनों की बात होती रही। फिर सो गए। अगले दिन इत्तफाक से दोनों टकरा गए ( असलियत में पहले से उन्होंने मिलने का प्लान बना लिया था )। वहां रूद्र ने शुष्मि की फोटो खिंचवाने की इच्छा को अलग ही तरह से पूरी की। शुष्मि भी कह रही थी कि ये अच्छा तरीका है कि सबके सामने सेल्फी भी ले ली और किसी को शक भी नहीं हुआ। उस रात भी दोनों ने काफी बात की। अगले दिन से ये बातें वीडियो कॉल पर होने लगीं। यहां तक कि दोनों कई बार साथ में घूमने भी गए और काफी देर से लौटे थे। मंदिर जाना, साथ में लंच करना और रात-रात भर बात करना, ये सिलसिला उनका कई दिनों तक चलता रहा। दोनों तीन बार लॉन्ग ड्राइव पर भी गए। 

  वैसे दोनों ही अलग-अलग कास्ट के हैं और ये बात दोनों अच्छी तरह से जानते थे। बावजूद इसके दोनों ही कुछ दिनों के लिए तो इस बात को भूल जाना चाहते थे। या ये कहें कि भूल ही गए थे। एक महीने बाद दोनों ने इस मुद्दे पर बात की। आखिर वो दिन भी आ गया जिससे हर प्यार करने वाला डरता है। 

 शुष्मि - मुझे जैसा पति चाहिए तुम बिलकुल वैसे ही हो। लेकिन, मेरे पापा नहीं मानेंगे। वो कास्ट को ज्यादा मानते हैं, कि लड़का अपनी कास्ट का होना चाहिए। 

रूद्र ने बीच में ही रोकते हुए पूछा - मैं दुनिया को नहीं मानता, मुझे सिर्फ तुमसे मतलब है। जो तुम कहोगी मैं वही करूंगा। तुम्हारे लिए मैं पूरी दुनिया से टकरा सकता हूं। लेकिन, तुम्हारे सामने मेरी आवाज नहीं निकलती। तुम क्या चाहती हो ? फिर दोनों काफी देर तक शांत रहे और सन्नाटे को सुनते रहे। फिर रूद्र ने ये ख़ामोशी तोड़ी। " एक  काम करो हम आज के बाद इस बारे में बात नहीं करेंगे और किसी को कुछ कहने की जरुरत नहीं है। जब सही   समय आएगा तब हम बात करेंगे। हम दोनों बात अब नहीं करेंगे। 

 जिस दिन दोनों की बात हुई थी। उस दिन अंत में रूद्र ने जिंदगी में पहली और आखिरी बार एक शायरी बोली थी। उसने शुष्मि से कहा, 

                 " मुझे घर में चारों तरफ दिखाई दे वो  

                     मुझे कमरे की दीवारें उसके जैसी चाहिए !  

                     अपने पिता की खातिर मना किया तुमने मुझे  

                     हे भगवान, मुझे बेटी इसके जैसी चाहिए। "

 रूद्र और शुष्मि के बीच कॉल ही नहीं बल्कि आखिरी बात थी जब दोनों एक दूसरे को समझ रहे थे। इसके बाद से दोनों के बीच सिर्फ मैसेज और स्टेटस के जरिये ही बात होती है। वो भी कभी-कभी। 

     

                                       #P.S.💗💗

                                     

                    

Wednesday, 30 December 2020

प्यारा सा अहसास

मेरा नाम है पाकस श्रीवास्तव और आज जो कहानी लिखने जा रहा हूँ उसके पात्रों के सिर्फ नाम काल्पनिक हैं। घटना इनके जीवन की है और मैं इन पात्रों से पूछने के बाद ही ये कहानी लिख रहा हूँ। 



  रूद्र को सालों से इस दिन का इंतज़ार था। आखिर १३ साल से भी ज्यादा समय गुजर चुका है। लेकिन, आज भी २००७ का दिसंबर का महीना रूद्र को अच्छे से याद है जब आखिरी बार उसे देखा था। वो साइकिल पर थी साथ ही ब्लू जीन्स और ब्राउन हाईनेक में बहुत ही प्यारी लग रही थी। वो शायद रूद्र पर बहुत गुस्सा थी क्योंकि रूद्र को उसने डांटा भी था और दूर जाने के लिए भी कहा था। पता नहीं क्यों उस डांट के बाद भी रूद्र का प्यार बढ़ता जा रहा था। उस वक़्त वो कहना बहुत कुछ चाहता था, लेकिन कह नहीं सका। क्योंकि उसका ध्यान shushmi के चेहरे से हट ही नहीं रहा था। वो आखिरी दिन था जब उसने शुष्मि को जी भर कर देखा था क्योंकि, रूद्र को अच्छे से पता था कि उस दिन के बाद शायद ही उसे देख पायेगा। वो अपनी हर गलती की माफ़ी मांगना चाहता था। रूद्र shushmi को खोना नहीं चाहता था, लेकिन शायद किस्मत को कुछ और ही मंजूर था।  

         पता नहीं ये इत्तेफ़ाक़ था या किस्मत का खेल कि आज १३ साल बाद फिर से शुष्मि और रूद्र एक दूसरे के सामने हैं और ये भी दिसंबर का ही महीना है। वैसे शायद इंतज़ार तो दोनों को ही था इस दिन का, लेकिन शुष्मि को अचानक यूँ अपने सामने देखकर रूद्र के जरूर होश उड़ गए। वो न तो कुछ बोल ही पा रहा और न ही उससे नज़रें ही हटा पा रहा था। शुष्मि शायद इस बात को भांप गई और वो खुद ही वहां से हट गई। क्योंकि उस जगह दोनों के घरवाले भी थे। वैसे दोनों वहां आए थे अपने-अपने काम से तो दोनों जल्दी ही काम में लग गए। काम में मशगूल होने के बावजूद रूद्र बार-बार शुष्मि को देखने में ही लगा हुआ था। वैसे shushmi ने भी ये नोटिस किया कि रूद्र बार-बार उसे ही देख रहा है। एक-दूसरे को नोटिस करते हुए दोनों अपने काम में लगे रहे। हाँ बात करने की पहल दोनों में से किसी ने भी नहीं की। पता नहीं दोनों के मन में क्या चल रहा था कि इतने साल बाद मिलने के बाद भी दोनों चाह कर भी एक दूसरे से HI भी नहीं बोल रहे थे। खैर उस दिन का काम खत्म होने के बाद दोनों अपने - अपने घर चले गए। कुछ भी हो दोनों के दिल में एक दूसरे से मिलने, बात न करने और छुप - छुप कर देखने का यह "अहसास बहुत ही प्यारा" था। क्योंकि दोनों ही इस बात को अच्छे से जानते थे कि दो दिन बाद फिर से दोनों को मिलना है। शायद इसीलिए दोनों ने अपने मन की बात जाहिर नहीं होने दी और रूद्र तो फूला नहीं समा रहा था कि जिसको वो प्यार करता है आज उसको इतने सालों बाद देखा वो भी इतने करीब से और बिना गुस्से में। काले और गुलाबी रंग की साड़ी में शुष्मि बहुत ही खूबसूरत लग रही थी। प्यारी तो वो हमेशा से ही है। 

      दो दिन बाद दोनों मिले, आज shushmi गाउन पहने हुए थी। आज तो उसको देखने के बाद रूद्र बस यही सोच रहा था कि परियां ऐसी ही होती होंगी, क्योंकि न तो वो ही दिखती हैं और न ही ये मुझसे बात करती है। आज जब शुष्मि ने रूद्र को देखा तो कॉम्पलिमेंट भी दिया कि अच्छे लग रहे हो। अब बेचारा रूद्र क्या बोले कि, "तुम्हारी आवाज सुनने के लिए मैं सालों से तड़प रहा था।"  रूद्र का तो ऐसा हाल था कि अभी बेहोश न हो जाए। वैसे उसने भी बोला कि बहुत सुन्दर लग रही हो वो भी अपने मन में। इन सबके लगभग एक घंटे बीतने के बाद दोनों में बात हुई। 

Shushmi - तुम गधे हो। 

Roodra - हाँ। 

Shushmi - इतने साल कहाँ थे ? 

Roodra - तुम्हें ढूंढ रहा था। 

Shushmi -तो दिखाई क्यों नहीं दिए ?

Roodra - खुद को तुम्हारे लायक बना रहा था। 

Shushmi - मतलब। 

Roodra - सॉरी, क्योंकि तुमने कहा था कि मैं तुमसे कभी ना मिलूं। लेकिन, २००२ में जब तुम्हें पहली बार देखा था तब ही तुमसे प्यार हो गया था। बस कभी कह नहीं सका। शायद कभी हिम्मत नहीं हुई या यूँ कहूं कि तुमसे डरता भी बहुत था। डर ये भी था कि तुम गुस्सा हो जाओगी और मुझे थप्पड़ न मार दो। साथ ही ये भी था कि अगर मैं उस वक़्त ये कहता कि मैं तुमसे प्यार करता हूँ तो हो सकता है कि मेरी ये बात तुम्हें बचकानी लगती और हम-तुम दूर हो सकते थे। स्कूल में सिर्फ तुम्हें देखने ही आता था। तुम्हारा वो मालगुड़ी डेज का गाना गुनगुनाना और गुलाबी रंग की ladybird साइकिल से स्कूल आना मैं कभी नहीं भूल सकता। याद है २००७ में अगस्त का महीना, एक दिन बारिश बहुत हो रही थी और तुम पांडेय जी की दुकान के सामने खड़ी थी, थोड़ा भीग गई थी शायद, बहुत प्यारी लग रही थी। 

      शुष्मि बस लगातार सुनती जा रही थी। तभी वो बोल पड़ी तुम इतना नोटिस करते थे मुझे। कभी कहा क्यों नहीं। मुझे कम से कम एक बार बता तो सकते थे। लेकिन, २००७ के बाद से तो ऐसे गायब हुए जैसे कोई क्राइम किया था। अरे कभी मिल तो सकते ही थे न एक बार। तब रूद्र प्यार से बोला इतने साल बीत गए, लेकिन मुझे डांटने की आदत नहीं गई तुम्हारी। ये सुनने के बाद शुष्मि शांत हुई, थोड़ा शर्मा गई थी शायद।  फिर रूद्र बोला, " मैं तुम्हे कभी खोना नहीं चाहता था, तो कभी मिलने की कोशिश नहीं की। हाँ सोशल मीडिया पर स्टॉक जरूर करता था लेकिन, कभी डिस्टर्ब नहीं करना चाहता था क्योंकि मुझे तुम्हारी मुस्कुराहट बहुत पसंद है।       

                       I LOVE YOU SHUSHMI "  




                  इसके बाद क्या हुआ जल्द बताऊंगा। 

Wednesday, 9 January 2019

मेरा नाम रूद्र है। मेरी उम्र से किसी को कोई मतलब नहीं, मुझे भी नहीं। हां पढ़ने में बहुत अच्छा हूं। ऐसा मम्मी कहती हैं। बस किसी तरह से ग्रेजुएशन कर लिया। हां कॉलेज बहुत अच्छा था। काफी कुछ सीखने को मिला। लेकिन एक दिक्कत हो गई, काफी सीखने और पढ़ने के बाद भी मुझे कोई जॉब नहीं मिली। बहुत इधर-उधर हाथ मारा, कई जगह इंटरव्यू भी दिए। लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ। खैर जैसे-तैसे अपना जेबखर्च निकाल ही लेता था। कई सॉफ्टवेयर भी सीखे थे, कुछ अलग भी करना आता था। मम्मी-पापा ने दिमाग भी काफी अच्छा बना दिया था। काफी ज्यादा बुरा लगने लगा। कॉलेज ख़त्म होने के लगभग ३ सालों बाद एक दोस्त की वजह से मुझे नौकरी मिल गई। काफी अच्छा काम था। बस लिखते रहना था। वैसे लिखना मुझे काफी ज्यादा पसंद था, तो मन लग गया। लेकिन अकेलापन भी लगता था। क्योंकि, कोई ऐसा नहीं था जिससे अपने दिल की कोई भी बात कह सको। जितना दोस्त से बात करता उतने में मज़ा नहीं आता था। कुछ महीनों बाद मेरे ऑफिस में एक लड़की आई। उस दिन उसने काले रंग का सलवार सूट पहन रखा था। कानों में झुमके भी पहन रखे थे, जो उसकी सुंदरता को और बढ़ा रहे थे। सच कहूं तो मुझे उससे पहली नज़र में ही प्यार हो गया था। लेकिन उससे कह नहीं सकता था। पता नहीं क्या सोचती मेरे बारे में, कि कैसा लड़का है। लड़की देखी नहीं कि आ गया लाइन मारने। बस रोज उसे छुप-छुप के देखता था। कई बार सोचा कि उससे बता दूं। लेकिन हिम्मत नहीं हुई। वैसे मैं आज तक शहर ज्यादा घूम नहीं पाया था, लेकिन घूमने की इच्छा बहुत थी।
  एक दिन किसी काम से हम दोनों के बीच पहली बार बातचीत हुई। मुझे ख़ुशी तो बहुत हो रही थी लेकिन ज़ाहिर नहीं कर सकता था। आखिर ऑफिस के हिसाब से उसका सीनियर भी था ना मैं। तो मैंने उससे बस ऐसे ही चलताऊ बात करी। कि हां तुम्हारा काम हो जाएगा। इस बात को कुछ दिन हो गए थे और मेरा मन उससे बात करने का कर रहा था। तो एक मैंने उससे उसकी पसंदीदा मूवी पूछ ही ली। लेकिन मुझे ये सुन कर झटका लगा कि जो मूवी मुझे पसंद थी, वही उसे भी पसंद थी। मैंने सोचा लो मेरी तो लाटरी ही लग गई। उसके बाद से  हम दोनों के बीच लगभग रोज बातें होने लगीं। पता नहीं क्यों जितना उससे बात करता फीलिंग्स उतनी ही बढ़ती जाती। लेकिन उसने कहा कि हम अच्छे दोस्त हैं। खैर मुझे तो बस उसका साथ चाहिए था  मिल रहा था, तो मैं मना क्यों करता। कभी -कभी हम दोनों ऑफिस के बाद घूमने भी निकल जाते। बस उसके चेहरे पर वो प्यारी सी स्माइल देखने के लिए मैं कुछ भी कर सकता था। मन तो करता था की i love you बोल दूं। लेकिन फिर सोचा वो बुरा न मान जाए। इस तरह से पूरा एक साल बीत गया। लेकिन मैं उससे कह नहीं सका,  क्योंकि मैं उसे हर्ट नहीं करना चाहता था। लेकिन अब मुझसे उससे कहे बिना नहीं रहा जा रहा था। मेरी नौकरी एक नई कंपनी में लग गई थी और तीन बाद मुझे ज्वाइन भी करना था लेकिन, अभी तक उसे बताया नहीं था। नौकरी दूसरे शहर में थी तो उसे बताना भी जरुरी था। क्योंकि मैं उसे किसी भी कीमत पर खोना नहीं चाहता था। उस दिन मैं उसके साथ एक रेस्टोरेंट में गया। हम दोनों ने ही उसकी पसंदीदा 'चाऊमीन' खाई। और उस दिन मैंने उसे सब कुछ सच-सच बता दिया। मैंने उसे अपनी नौकरी के बारे में भी बताया और उस दिन मैंने उसे अपने दिल की सारी बात बता दी। 
     उस दिन उसने कुछ नहीं बोला। बस चुपचाप चली गई। लेकिन फिर भी मैंने उसको उसके घर पर छोड़ा और फिर अपने घर गया। उसके बाद उसने मुझसे बात नहीं और ना ही मेरा फ़ोन उठाया। मेरे जाने का भी दिन आ गया। मैंने सोचा कि वो आएगी लेकिन, वो मुझसे मिलने नहीं आई। मेरा मन नहीं कर रहा था की मैं जाऊं। बस इतना चाहता था कि वो अगर एक बार बोल दे तो मैं रुक जाऊंगा। लेकिन वो तो उस दिन से मिली ही नहीं थी। मैं बेमन से दूसरे शहर आ गया। उसको कई बार कॉल की लेकिन उसने नहीं उठाया। मैं रोज उसकी फोटो देख रोता हूं कि उस दिन मुझे अपने दिल की बात नहीं बतानी चाहिए थी। लेकिन अब बता दिया तो बता दिया। कम से कम उसे अंधेरे में तो नहीं रखा। इस बात को आज एक साल हो गए हैं। आज अचानक से मुझे एक कॉल आई। मैंने फ़ोन उठाया तो उधर की आवाज सुन कर मेरी आँखों में आंसू आ गए। उधर से एक आवाज आई 'कैसे हो '......वो वही थी, पूरे एक साल बाद। मन तो किया कि खूब लड़ाई करुं, खूब सुनाऊं उसे। लेकिन उसकी आवाज़ सुनकर मेरा सारा गुस्सा गायब हो गया। फ़ोन पर ही मैं लगभग आधे घंटे तक रोया। वो बस चुपचाप सुनती ही रही। उसने मुझे फिर बहुत समझाया। फिर अचानक से उसने मुझे डांट दिया कि 'चुप होते हो या फिर फ़ोन काटूं'। उस दिन उसने बताया कि वो किसी और से प्यार करती थी लेकिन, वो नहीं चाहती थी कि मैं दूसरे शहर जाऊं। क्योंकि जिस दिन मुझे निकलना था उसके दो दिन बाद ही उसकी शादी थी। वो चाह कर भी मेरा फ़ोन नहीं उठा पाई और शादी के बाद उसे नंबर भी बदलना पड़ा। आज वो माँ बनने वाली है और अपनी ज़िन्दगी में खुश है। 
     वो खुश है, ये सुन कर मुझे ख़ुशी हो रही थी। लेकिन और बाकी बातें मुझे दर्द दे रही थीं। लेकिन मैंने उसे ज़ाहिर नहीं होने दिया। हम दोनों ने दो घंटे तक बात की। लेकिन मैं बहुत दुखी था। संयोग देखो कि आज वैलेंटाइन्स डे है। लेकिन मुझे थोड़ी सी भी ख़ुशी नहीं हो रही थी। मैं रोना चाहता था, वो भी चिल्ला-चिल्ला कर। मैं तुरंत भाग कर अपने ऑफिस की छत पर चला गया। खुद को शांत करने की बहुत कोशिश कर रहा था लेकिन, नहीं कर पा रहा था। आज मैं अपने पहले ऑफिस के पहले दिन से भी ज्यादा अकेला महसूस कर रहा हूं। बस अपना यही दर्द ले कर छत की दीवार के कोने में खड़ा हो गया। इसके बाद क्या हुआ नहीं पता। बस अब हवा के अलावा और कुछ भी नहीं महसूस हो रहा है ...... मेरे दिल से  आवाज आ रही थी कि
                                         I care about you more than you think and I LOVE YOU more than you know.

Wednesday, 18 July 2018

रूद्र


जब रूद्र पैदा हुआ था तो सभी बहुत ही ज्यादा खुश हुए थे और दादा जी तो जैसे हवा में ही उड़ रहे थे। आखिर उनके लिए एक खिलौना जो आ गया था। दादी ने भी बच्चे को अपनी गोद में लिया और खिलाने लगीं लेकिन पता नहीं क्यों उनके मन में कुछ अटपटा सा लग रहा था कि जैसे कुछ तो सही नहीं हो रहा है। जब दादा ने बच्चे को लेने के लिए हाथ बढ़ाया तो दादी का मंगलसूत्र बच्चे के हाथ में फंस कर टूट गया। दादी तो काफी ज्यादा डर गईं। सभी ने समझाया कि हो जाता है। लेकिन उनके मन का वहम कम नहीं हुआ। वो तो बस बच्चे को अपशकुन मान कर ही बैठ गईं थीं।
   वैसे सभी ने एकमत हो कर उसका नाम रखा था ‘छोटू’। दादा जी तो दिन भर छोटू को लेकर घूमते रहते थे। यहां तक कि उसके बिना तो जैसे दादा जी का सांस लेना भी दूभर हो गया था। उनका बस चलता तो उसे मार्निंग वॉक पर भी साथ ही लेकर जाते। लेकिन दादी के डांटने के बाद उन्होंने इसकी जिद छोड़ दी।
   समय बीतने के साथ जैसे घर की खुशियां कम होती जा रही थीं। दादी सभी से कहती थीं कि यह सब इसकी वजह से ही हो रहा है। लेकिन सभी उन्हें ही डांट देते थे। अब छोटू दो साल का हो चुका है। लेकिन दादी आज भी उसे प्यार की नजर से नहीं देख पाई हैं। एक दिन गलती से छोटू के हाथ से खेल-खेल में पानी गिर जाता है। तो दादी उसे खूब डांटती हैं। इसके बाद छोटू गुस्से में अपने कमरे में चला जाता है। अगली सुबह दादी जब नहाने बाथरूम में गईं तो वहां पड़े पानी में फिसल गईं। सभी उन्हें  आनन-फानन में हॉस्पिटल लेकर भागे। मम्मी भी छोटू को लेने आईं तो देखा कि वह एक ही गुड़िया को बार-बार हाथ से ठोकर मार रहा था। हॉस्पिटल में डॉक्टर ने बोला कि सिर में ज्यादा गहरी और अंदरूनी चोट होने के कारण उन्हें बचा नहीं पाए। दादी के जाने के बाद से दादा जी काफी ज्यादा टूट गए थे। इस बात को दो महीने बीत चुके थे और अब वो अधिकतर समय अकेले और चुपचाप रहने लगे थे। वो अब ज्यादा किसी से बात नहीं करते थे। एक दिन सुबह के सात बजे दादा जी बैठ कर टीवी पर समाचार देख रहे थे कि तभी रूद्र आकर उनसे नए खिलौने दिलाने की जिद करने लगता है। वो पहले तो उसे प्यार से समझाते हैं कि अभी नहीं बाद में ले देंगे। लेकिन वह उनका हाथ पकड़ कर घसीटने लगता है। तभी दादा उसे बहुत तेज डांटते हैं और छड़ी उठाकर पैर पटकते हुए वहां से चले जाते हैं। रूद्र भी वहां से गुस्सा होकर अपने कमरे में चला जाता है। उसकी मम्मी देखती हैं कि वह एक खिलौने को बार-बार खिलौने वाली पानी की टंकी में डाल रहा है और निकाल रहा है। वो सोचती हैं कि शायद गुस्से में यह सब कर रहा है। थोड़ी देर बाद ही रूद्र के पिता के पास एक फोन आता है कि उनके पिता हॉस्पिटल में हैं। जब सभी वहां गए तब किसी ने बताया कि वो एक खुले हुए मेनहोल में गिर गए थे। दादा जी ठीक तो हो गए लेकिन जिंदगी भर के लिए वो बिस्तर पर ही पड़े रहने को मजबूर हो गए। उनके शरीर का दायां हिस्सा लकवाग्रस्त हो गया था। घर आने के बाद से रूद्र उनको घूर कर देखने लगा था। अब तो दादा जी को भी उससे डर लगने लगा। अब तो उन्होंने रूद्र को अपने पास बुलाना भी छोड़ दिया था। उनकी इस आदत से अब उनके बेटा-बहू भी उनसे थोड़ा गुस्सा रहने लगे थे। दादा जी के साथ हादसा हुए एक महीना बीत चुका था। लेकिन अब उनके मन में रूद्र के लिए जरा सा भी प्यार नहीं बचा था। एक दिन रूद्र अपने पापा से स्कूल नहीं जाने की जिद करने लगा। साथ ही वो घूमने की जिद कर रहा था। लेकिन पापा किसी और ही काम में व्यस्त और परेशान थे तो उन्होंने रूद्र को तेज डांटा और वैसे ही अपने ऑफिस के लिए निकल गए। वहीं रूद्र भी हांॅल में बैठकर अपने खिलौनों के साथ खेलने लगा। मां भी अपने रोजमर्रा के कामों को निपटा कर उसके पास ही बैठ गईं। थोड़ी देर बाद ही मां के फोन पर एक कॉल आती है। वो फोन लेने के लिए अपने कमरे में गईं। फोन पर किसी ने बताया कि उनके पति की कार एक खड़ी हुई ट्रक से टकरा गई और मौके पर ही उनकी मौत हो गई। वो तुरंत ही रूद्र की तरफ दौड़ीं कि उसे लेकर हॉस्पिटल जाएं। लेकिन कमरे से निकलते ही उनके पांव ठिठक गए। जब उन्होंने देखा कि रूद्र अपनी खिलौने वाली कार को एक खिलौने वाली ट्रक से बार-बार टक्कर मार रहा है।