Wednesday, 18 July 2018

रूद्र


जब रूद्र पैदा हुआ था तो सभी बहुत ही ज्यादा खुश हुए थे और दादा जी तो जैसे हवा में ही उड़ रहे थे। आखिर उनके लिए एक खिलौना जो आ गया था। दादी ने भी बच्चे को अपनी गोद में लिया और खिलाने लगीं लेकिन पता नहीं क्यों उनके मन में कुछ अटपटा सा लग रहा था कि जैसे कुछ तो सही नहीं हो रहा है। जब दादा ने बच्चे को लेने के लिए हाथ बढ़ाया तो दादी का मंगलसूत्र बच्चे के हाथ में फंस कर टूट गया। दादी तो काफी ज्यादा डर गईं। सभी ने समझाया कि हो जाता है। लेकिन उनके मन का वहम कम नहीं हुआ। वो तो बस बच्चे को अपशकुन मान कर ही बैठ गईं थीं।
   वैसे सभी ने एकमत हो कर उसका नाम रखा था ‘छोटू’। दादा जी तो दिन भर छोटू को लेकर घूमते रहते थे। यहां तक कि उसके बिना तो जैसे दादा जी का सांस लेना भी दूभर हो गया था। उनका बस चलता तो उसे मार्निंग वॉक पर भी साथ ही लेकर जाते। लेकिन दादी के डांटने के बाद उन्होंने इसकी जिद छोड़ दी।
   समय बीतने के साथ जैसे घर की खुशियां कम होती जा रही थीं। दादी सभी से कहती थीं कि यह सब इसकी वजह से ही हो रहा है। लेकिन सभी उन्हें ही डांट देते थे। अब छोटू दो साल का हो चुका है। लेकिन दादी आज भी उसे प्यार की नजर से नहीं देख पाई हैं। एक दिन गलती से छोटू के हाथ से खेल-खेल में पानी गिर जाता है। तो दादी उसे खूब डांटती हैं। इसके बाद छोटू गुस्से में अपने कमरे में चला जाता है। अगली सुबह दादी जब नहाने बाथरूम में गईं तो वहां पड़े पानी में फिसल गईं। सभी उन्हें  आनन-फानन में हॉस्पिटल लेकर भागे। मम्मी भी छोटू को लेने आईं तो देखा कि वह एक ही गुड़िया को बार-बार हाथ से ठोकर मार रहा था। हॉस्पिटल में डॉक्टर ने बोला कि सिर में ज्यादा गहरी और अंदरूनी चोट होने के कारण उन्हें बचा नहीं पाए। दादी के जाने के बाद से दादा जी काफी ज्यादा टूट गए थे। इस बात को दो महीने बीत चुके थे और अब वो अधिकतर समय अकेले और चुपचाप रहने लगे थे। वो अब ज्यादा किसी से बात नहीं करते थे। एक दिन सुबह के सात बजे दादा जी बैठ कर टीवी पर समाचार देख रहे थे कि तभी रूद्र आकर उनसे नए खिलौने दिलाने की जिद करने लगता है। वो पहले तो उसे प्यार से समझाते हैं कि अभी नहीं बाद में ले देंगे। लेकिन वह उनका हाथ पकड़ कर घसीटने लगता है। तभी दादा उसे बहुत तेज डांटते हैं और छड़ी उठाकर पैर पटकते हुए वहां से चले जाते हैं। रूद्र भी वहां से गुस्सा होकर अपने कमरे में चला जाता है। उसकी मम्मी देखती हैं कि वह एक खिलौने को बार-बार खिलौने वाली पानी की टंकी में डाल रहा है और निकाल रहा है। वो सोचती हैं कि शायद गुस्से में यह सब कर रहा है। थोड़ी देर बाद ही रूद्र के पिता के पास एक फोन आता है कि उनके पिता हॉस्पिटल में हैं। जब सभी वहां गए तब किसी ने बताया कि वो एक खुले हुए मेनहोल में गिर गए थे। दादा जी ठीक तो हो गए लेकिन जिंदगी भर के लिए वो बिस्तर पर ही पड़े रहने को मजबूर हो गए। उनके शरीर का दायां हिस्सा लकवाग्रस्त हो गया था। घर आने के बाद से रूद्र उनको घूर कर देखने लगा था। अब तो दादा जी को भी उससे डर लगने लगा। अब तो उन्होंने रूद्र को अपने पास बुलाना भी छोड़ दिया था। उनकी इस आदत से अब उनके बेटा-बहू भी उनसे थोड़ा गुस्सा रहने लगे थे। दादा जी के साथ हादसा हुए एक महीना बीत चुका था। लेकिन अब उनके मन में रूद्र के लिए जरा सा भी प्यार नहीं बचा था। एक दिन रूद्र अपने पापा से स्कूल नहीं जाने की जिद करने लगा। साथ ही वो घूमने की जिद कर रहा था। लेकिन पापा किसी और ही काम में व्यस्त और परेशान थे तो उन्होंने रूद्र को तेज डांटा और वैसे ही अपने ऑफिस के लिए निकल गए। वहीं रूद्र भी हांॅल में बैठकर अपने खिलौनों के साथ खेलने लगा। मां भी अपने रोजमर्रा के कामों को निपटा कर उसके पास ही बैठ गईं। थोड़ी देर बाद ही मां के फोन पर एक कॉल आती है। वो फोन लेने के लिए अपने कमरे में गईं। फोन पर किसी ने बताया कि उनके पति की कार एक खड़ी हुई ट्रक से टकरा गई और मौके पर ही उनकी मौत हो गई। वो तुरंत ही रूद्र की तरफ दौड़ीं कि उसे लेकर हॉस्पिटल जाएं। लेकिन कमरे से निकलते ही उनके पांव ठिठक गए। जब उन्होंने देखा कि रूद्र अपनी खिलौने वाली कार को एक खिलौने वाली ट्रक से बार-बार टक्कर मार रहा है।

Friday, 18 May 2018

जैसे-जैसे वक़्त बदलता जा रहा है वैसे-वैसे समाज में लोगों की मानसिकता भी कुछ ज्यादा बदलती जा रही है।  लोग लगातार आगे बढ़ने के सपने देख रहे हैं।  कुछ तो जिंदगी के हर क्षेत्र में काफी बेहतर कर रहे हैं।  लेकिन इन सभी के बावजूद लड़कियों के प्रति लोगों की सोच कुछ ज्यादा नहीं बदली है। बस पहले ये था कि पैदा नहीं होने देना चाहते थे और अब हालात ये हैं कि उन्हें चैन से जीने नहीं देना चाहते हैं। पैदा होते ही कइयों को मार दिया जाता है और कुछ को तो रेप कर के मार दिया जाता है। चाहे वो किसी भी धर्म की हो, बेटी तो आखिर बेटी ही होती है। कठुआ की हो या उन्नाव की, भोपाल की हो या फिर एटा की हो। देश में रेप के मामले लगातार बढ़ते ही जा रहे हैं। आजकल तो लोगों ने इसे भी हिन्दू-मुस्लिम में बांट दिया है। एक सवाल पूछना चाहता हूँ कि समय चाहे कोई भी हो ज्यादातर जुल्म और यातनायें महिलाओं के खिलाफ क्यों होते आये है। हमेशा उसे अबला और निर्बलों की तरह ही क्यों दिखाया जाता है। देश में हमेशा से ताकतवर महिलाओं ने भी जन्म लिया है। चाहे वो रजिया सुल्तान हो फिर रानी लक्ष्मीबाई, लेकिन फिर भी हम इनकी गाथाओं को ज्यादा नहीं याद करते हैं। क्योंकि शायद वो औरतें हैं और अगर हमने उनके बारे में ज्यादा बातें की तो कहीं न कहीं हमारे पुरुष प्रधान समाज के पुरुषों के अहम् को ठेंस पहुंचेगा। अभी कुछ दिनों पहले ही मैं एक अधिवक्ता जी से मिला था। उनसे रेप के मुददे पर बात हो रही थी। तो बातों-बातों में उन्होंने एक लाइन बोली कि एक बार एक लड़की छोटे कपड़े पहन कर रोड पर मेरे सामने से निकली तो मैंने तो उसकी तरफ देखा भी नहीं लेकिन मेरे ही पास खड़े कुछ लड़के उसे मुड़-मुड़ के देखने लगे। अब बताओ कि इतने छोटे कपड़े पहन कर निकलेगी तो लोगों की सोच पर तो असर पड़ेगा ही। उन्होंने लड़की की तरफ देखा नहीं था लेकिन फिर भी उन्हें ये जरूर याद था कि उसने छोटे कपड़े पहन रखे थे।
      अभी हाल ही में मैं कुछ दिनों पहले ही फेसबुक पर एक पोस्ट पढ़ रहा था। मुझे उसका नाम तो याद नहीं है लेकिन फिर भी उसके बारे में बताना चाहुंगा क्योंकि उसमे कुछ ऐसी बातें थी। जिनके बारे में सभी को पता होनी चाहिए कि  हर बार गलती किसी लड़की की ही क्यों होती है जैसे उनके किसी भी तरह के कपड़े पहनने की वजह से किसी की सोच कैसे खराब हो सकती है। आखिर सिर्फ अपने मन के कपड़े पहनने से समाज कैसे गन्दा हो सकता है। जिस स्त्री के कारण हम पैदा होते हैं, हमारी माँ का रूप है, जो हमारी बहन का रूप है। जो पत्नी के रूप में अपना मायका, सगे-सम्बन्धी छोड़कर हमारे घर आती है। जो हमें नए-नए संस्कारों का ज्ञान कराती है। वो स्त्री रूप गलत कैसे हो सकता है।मैंने उस पोस्ट से कुछ फोटोज उठा ली थीं जो मैं यहां जोड़ना चाहता हूं।शादी से पहले सिर्फ लड़की से ही क्यों पूछा जाता कि खाना बना लेती हो ? नाचना आता है ? सास-ससुर का ख्याल रखना। ये सब बातें लड़कों से क्यों नहीं पूछी जाती हैं कि बेटा नाच लेते हो, खाना बना लेते हो, शादी के बाद बच्चे संभाल लोगे ? मतलब अगर कुछ भी गलत हो तो उसकी जिम्मेदार सिर्फ लड़कियां ही क्यों ?

















            आप सब भी अपनी राय दीजियेगा ये आखिर क्यों ? क्यों हम समानता का दिखावा करने में लगे हैं ?
   

Tuesday, 6 March 2018

Hi.... मेरा नाम पाकस श्रीवास्तव है। ये तो आप जानते ही हैं फिर पता नहीं क्यों बता रहा हूँ। खैर ''पता'' एक ऐसी चीज है जिसके बारे में सभी को पता है लेकिन फिर भी किसी को नहीं पता कि आखिर मुझे पता है भी या नहीं। मैं पिछले साल अक्टूबर में पटना गया था।  काफी अच्छा शहर है। जब मैं वापस आ रहा था तो मुझे ट्रेन में एक अंकल मिले......नाम था संजय। बाकी आगे का मैने पूछा भी नहीं क्योंकि उसकी कोई जरुरत ही नहीं थी।
                                मेरी ट्रेन लगभग १० घंटे लेट थी।  पटना स्टेशन पर सबह ४ बजे से बैठे-बैठे दिमाग ख़राब हो गया था।  एक तो बिना नहाये  तो और ख़राब लग रहा था। मैं तो सुबह ३ बजे ही स्टेशन पर आ गया था और  माता जी आई थीं लगभग ११ बजे।  खैर इंतज़ार ही मज़ा ही कुछ अलग होता है। हज़ार तरीके के लोगों को देखने और मिलने का मौका मिलता है। खैर ट्रेन आई और मैं चढ़ते ही अपनी ही सीट पर सो गया। ३ घंटे बाद उठा मैं सो कर। ट्रेन बिहार पार कर चुकी थी और आउटर पर ही १ घंटे से रुकी थी। शाम के लगभग ३ बजे होंगे जब हम लोगों की बातचीत शुरू हुई। उस समय हमारे एरिया की ८ सीटों  में  ९ लोग थे। उनमे से एक बच्चा था ५ साल का शायद , तो बाकि हम ८ लोगों में किसी अंधविश्वास को लेकर बातें शुरू हुई थीं ..... अब वो क्या था ये मुझे नहीं याद है। लेकिन उन लोगों के बारे जरूर याद है। वैसे ऐसे समय आस-पास के भी लोग अपने-आप ही आप की बातों में मज़े से मज़े लेते हैं। खैर हम सभी की बातें इधर-उधर से घुमते-घामते प्यारे भगवान जी पर आ गई.. भगवान ऐसे हैं, भगवान वैसे हैं, भगवान खाना खाते हैं, भगवान खाना नहीं खाते हैं, भगवान सोते हैं की नहीं ऐसी ही फालतू बातों पर हम सभी बकवास कर रहे थे। मैं  लिए नहीं लिख रहा की हम में से किसने क्या कहा, क्यों कहा , या फिर क्या क्या बकवास की। इतनी सारी बातें हुई थीं........ कोई कह रहा था कि भगवान है तो कोई कह रहा था कि भगवान घोड़े बेच कर सो भी जाता है। खैर इतनी सारी बातों में मुझे जो सबसे ज्यादा पसंद आया और अभी तक याद है वो संजय अंकल ने मुझसे बोला था कि........ एक बार एक कुम्हार जो धर्म, जाति और बाकि ऐसे ही सारे आडम्बरों से थक चुका था। एक दिन उसने भगवान से यूँ ही मज़ाक-मज़ाक में काफी मज़ेदार अंदाज़ में बात बोली कि......       
                    "हे भगवान. तू भी कलाकार,  मैं भी कलाकार ,
                      तूने मुझ जैसे पुतले असंख्य बनाकर धरती पर हैं भेजे
                      और मैंने तुझ जैसे पुतले असंख्य बनाकर इसी धरती पर हैं बेचे।
                       शर्म तो तब आती है, जब तेरे बनाये पुतले आपस में लड़ते-झगड़ते हैं।
                       गर्व तो तब महसूस होता है,
                       जब मेरे बनाये पुतले के सामने तेरे पुतले शीश नवा कर चले जाते हैं। "

Saturday, 10 February 2018

अगर आप सभी बुरा ना तो आप सभी से एक बात पूछना चाहता हूं कि ये गौ हत्या और गौ रक्षा किस चिड़िया का नाम है। अभी कुछ समय पहले ही एक पार्टी के लोगों ने गौ हत्या और गौ रक्षा पर लम्बी लड़ाई लड़ी थी भाई...  शायद कई लोगों को दौड़ा-दौड़ाकर मारा भी था "शायद"। पता नहीं कितना कामयाब हुए "बेचारे" और कितना नहीं। "शायद" कइयों के हाथ पैर भी टूट गए थे।
                             खैर बात ये है कि कल मैं एक दोस्त के घर गया था।  तो मुझे कुछ दिखा, मतलब उसके घर के बाहर ही एक गाय की मौत हो गई थी। गाय की गलती बस इतनी थी कि वो गलत घर में पली हुई थी। मतलब बेचारी दूध तो देती थी लेकिन बेचारी को खाना सही से नहीं मिलता था। सुबह ही उसे घर से हांक दिया जाता था। सुबह ८-९ बजे के बीच दूध दुहने के साथ थोड़ा भूसा चूनी देते थे। फिर घर से भगा दिया जाता था। फिर ४ बजे ले जाते थे और दुहने के बाद छोड़ देते थे। गाय कहाँ  जा रही है, क्या खा रही है, कुछ खा भी रही है या नहीं  इन सभी से उन्हें कोई मतलब नहीं होता।  यार मैं एक बात पूछना चाहता हूँ कि जब गायों या अन्य जानवरों को खिलाने और पालने की हिम्मत और जज्बा नहीं हो तो पालने का दिखावा करते ही क्यों हो यार। सिर्फ दूध और दूध बेचकर आने वाले पैसों की लालच में। पहले मवेशियों को तो संभल लो भाइयों।
                              मैं  रात ११ बजे तक उसके घर पर ही था। लेकिन गाय का मालिक केवल एक बार ६ बजे आया था। फिर नहीं लौटा क्यों ये मुझे नहीं पता, शायद अब तो गाय दूध देने लायक नहीं रही ना। कोई  please ये बताएगा कि ये "गौरक्षा" कहलायेगी या  फिर "गौहत्या" का नाम दिया जायेगा इसे। सिर्फ यही नहीं ऐसे जाने कितने ही लोग होंगे जो सिर्फ दूध की लालच में गाय की दुर्दशा कर देते हैं।