Friday, 18 May 2018

जैसे-जैसे वक़्त बदलता जा रहा है वैसे-वैसे समाज में लोगों की मानसिकता भी कुछ ज्यादा बदलती जा रही है।  लोग लगातार आगे बढ़ने के सपने देख रहे हैं।  कुछ तो जिंदगी के हर क्षेत्र में काफी बेहतर कर रहे हैं।  लेकिन इन सभी के बावजूद लड़कियों के प्रति लोगों की सोच कुछ ज्यादा नहीं बदली है। बस पहले ये था कि पैदा नहीं होने देना चाहते थे और अब हालात ये हैं कि उन्हें चैन से जीने नहीं देना चाहते हैं। पैदा होते ही कइयों को मार दिया जाता है और कुछ को तो रेप कर के मार दिया जाता है। चाहे वो किसी भी धर्म की हो, बेटी तो आखिर बेटी ही होती है। कठुआ की हो या उन्नाव की, भोपाल की हो या फिर एटा की हो। देश में रेप के मामले लगातार बढ़ते ही जा रहे हैं। आजकल तो लोगों ने इसे भी हिन्दू-मुस्लिम में बांट दिया है। एक सवाल पूछना चाहता हूँ कि समय चाहे कोई भी हो ज्यादातर जुल्म और यातनायें महिलाओं के खिलाफ क्यों होते आये है। हमेशा उसे अबला और निर्बलों की तरह ही क्यों दिखाया जाता है। देश में हमेशा से ताकतवर महिलाओं ने भी जन्म लिया है। चाहे वो रजिया सुल्तान हो फिर रानी लक्ष्मीबाई, लेकिन फिर भी हम इनकी गाथाओं को ज्यादा नहीं याद करते हैं। क्योंकि शायद वो औरतें हैं और अगर हमने उनके बारे में ज्यादा बातें की तो कहीं न कहीं हमारे पुरुष प्रधान समाज के पुरुषों के अहम् को ठेंस पहुंचेगा। अभी कुछ दिनों पहले ही मैं एक अधिवक्ता जी से मिला था। उनसे रेप के मुददे पर बात हो रही थी। तो बातों-बातों में उन्होंने एक लाइन बोली कि एक बार एक लड़की छोटे कपड़े पहन कर रोड पर मेरे सामने से निकली तो मैंने तो उसकी तरफ देखा भी नहीं लेकिन मेरे ही पास खड़े कुछ लड़के उसे मुड़-मुड़ के देखने लगे। अब बताओ कि इतने छोटे कपड़े पहन कर निकलेगी तो लोगों की सोच पर तो असर पड़ेगा ही। उन्होंने लड़की की तरफ देखा नहीं था लेकिन फिर भी उन्हें ये जरूर याद था कि उसने छोटे कपड़े पहन रखे थे।
      अभी हाल ही में मैं कुछ दिनों पहले ही फेसबुक पर एक पोस्ट पढ़ रहा था। मुझे उसका नाम तो याद नहीं है लेकिन फिर भी उसके बारे में बताना चाहुंगा क्योंकि उसमे कुछ ऐसी बातें थी। जिनके बारे में सभी को पता होनी चाहिए कि  हर बार गलती किसी लड़की की ही क्यों होती है जैसे उनके किसी भी तरह के कपड़े पहनने की वजह से किसी की सोच कैसे खराब हो सकती है। आखिर सिर्फ अपने मन के कपड़े पहनने से समाज कैसे गन्दा हो सकता है। जिस स्त्री के कारण हम पैदा होते हैं, हमारी माँ का रूप है, जो हमारी बहन का रूप है। जो पत्नी के रूप में अपना मायका, सगे-सम्बन्धी छोड़कर हमारे घर आती है। जो हमें नए-नए संस्कारों का ज्ञान कराती है। वो स्त्री रूप गलत कैसे हो सकता है।मैंने उस पोस्ट से कुछ फोटोज उठा ली थीं जो मैं यहां जोड़ना चाहता हूं।शादी से पहले सिर्फ लड़की से ही क्यों पूछा जाता कि खाना बना लेती हो ? नाचना आता है ? सास-ससुर का ख्याल रखना। ये सब बातें लड़कों से क्यों नहीं पूछी जाती हैं कि बेटा नाच लेते हो, खाना बना लेते हो, शादी के बाद बच्चे संभाल लोगे ? मतलब अगर कुछ भी गलत हो तो उसकी जिम्मेदार सिर्फ लड़कियां ही क्यों ?

















            आप सब भी अपनी राय दीजियेगा ये आखिर क्यों ? क्यों हम समानता का दिखावा करने में लगे हैं ?