भाग - 2
वैसे तो मैं उस कार के बारे में ही सोच रहा था, लेकिन सोचा कि हो जाता है कभी-कभी ऐसा। मैं घर वापस आ गया हालांकि बिना चालक की उस कार को भूल नहीं पाया। हाथ में चोट भी लग गई थी जिसे देखकर मम्मी ने पूछा, जब मैंने उन्हें सारी बात बताई तो वो काफी डर गईं। वो बहुत ज्यादा पूजा पाठ करती थीं तो पता नहीं कहाँ से एक रुद्राक्ष लाकर मुझे पहना दिया। बस मैंने उन्हें कार में किसी के न होने की बात नहीं बताई। कुछ दिनों बाद मुझे अपने एडमीशन के लिए दिल्ली जाना पड़ा। काॅलेज में एडमीशन करवा कर वापस आने के लिए जब मैं ट्रेन पर चढ़ने लगा, तो मुझे लगा कि किसी ने मेरा पैर पकड़ कर खींच लिया हो, मैं जमीन पर गिर पड़ा। लेकिन गाड़ी रुकी होने की वजह से मुझे ज्यादा चोट तो नहीं लगी। लेकिन मैं सोच में पड़ गया कि मेरा पैर किसने खींचा। मैंने इधर-उधर देखा भी लेकिन कोई दिखाई नहीं दिया। मैंने सोचा कि मैं ही गलत तरीके से चढ़ रहा होउंगा इसीलिए गिर गया। मैं उठकर दोबारा चढ़ गया। मैं घर तो आ गया लेकिन इस बार का गिरना मुझे काफी अज़ीब लग रहा था।
जब मैं घर आया तो मम्मी ने मुझे बताया कि भाभी की तबियत ( कुछ दिनों से )ज्यादा खराब है। मैं रात में घर पहुंचा था और खाना खाकर सो गया। थका हुआ था तो सुबह देर तक सोता रहा। जब मैं उठा तो 11 बज चुके थे, काफी देर हो गई थी और भाभी को डाॅक्टर के पास भी ले जाना था। मैं जल्दी से उठा और नहा-धोकर तैयार हो गया। भाभी को लेकर जब मैं चलने लगा तो पता नहीं क्यों उन्होंने मना कर दिया! लेकिन काफी समझाने के बाद वो चलने के लिए तैयार हो गईं। डाॅक्टर ने काफी जाँच करने के बाद मामूली पेट दर्द की बात बताई। मैं भाभी को लेकर वापस आ रहा था तो मुझे काफी अजीब लग रहा था। सच बताऊं तो मुझे बाईक बहुत भारी लग रही थी, और काफी डर भी लग रहा था। घर वापस आने के बाद भाभी सीधे अपने कमरे में चली गईं। उन्होंने दोपहर में खाना भी नहीं खाया।
लगभग तीन या चार दिन बाद मैं मार्निंग वाक के लिए जा रहा था। अभी कुछ दूर ही गया था कि बिजली के खंभे से एक तार टूट कर अचानक से मेरे सामने आ गया (गिर गया)। मैं सही-सलामत था, क्योंकि वो तार मुझसे सिर्फ कुछ इंच की दूरी पर गिरा था। मैं काफी ज्यादा डर गया था और वापस चला आया। घर में घुसते ही सामने मम्मी मिल गईं और पूछने लगीं कि आज जल्दी क्यों चला आया तू? मैंने भी नींद का बहाना बना दिया। मैं अपने कमरे में जा ही रहा था कि अचानक सामने भाभी मिल गईं। पता नहीं क्यों वो मुझे देखकर मुस्कुरा रही थीं। भईया के जाने के बाद भाभी बहुत कम ही हँसती थीं लेकिन आज मुझे कुछ अटपटा सा लगा। पता नहीं क्यों लेकिन भाभी का मुस्कुराना मुझे अच्छा नहीं लगा। मैं भी हल्के से मुस्कुरा दिया और अपने कमरे में चला गया।
मैं जब नहा रहा था तो बार-बार भाभी की वो हँसी याद आ रही थी। मैं नहा-धोकर जब नाश्ता करने बैठा तो सैंडविच देते समय गलती से मेरा हाथ भाभी के हाथ से छू गया। उन्होंने अपना हाथ जल्दी से खींच लिया जैसे करंट लग गया हो। उनका हाथ काफी गर्म भी था। मैंने उनसे पूछा भी लेकिन उन्होंने यह कहते हुए बात टाल दिया कि अभी किचन में थी तो शायद गैस की आँच की गर्मी है। मैंने सोचा कि आँच से हाथ इतने गर्म कैसे हो सकते हैं! मैंने जल्दी से नाश्ता किया और आकाश के पास जाने के लिए तैयार होने लगा। मैं आकाश के घर से लौट रहा था तो पता नहीं क्यों आज मंदिर जाने का मन कर रहा था। मैं मंदिर से दर्शन करके लौट रहा था कि सीढ़ियों पर ही एक बाबा जी मिल गए। मैंने बाबा जी के पैर छुए, उनसे प्रसाद लिया और वापस आने के लिए मुड़ा। दो-चार सीढ़ी उतरते ही पीछे से किसी ने आवाज दी। मैंने पीछे देखा लेकिन अनजाने चेहरे देखकर मैं फिर वापस आने लगा। तभी बाबा जी ने आवाज लगाई और कहने लगे कि तुम्हें मैंने ही बुलाया है। मैंने भी पूछा,‘‘जी बताइए कोई गलती हो गई क्या मुझसे?’’ पहले तो ऐसा लगा कि वो कुछ सोच रहे हैं। फिर उन्होंने कहा कि शायद हाँ भी और शायद ना भी। मैंने पूछा,‘‘ बाबा मैं कुछ समझा नहीं, जरा खुलकर बताइए।’’ उन्होंने मुझसे यह भी पूछा कि आज तुम्हारी मोटरसाइकल भारी तो नहीं लग रही है। मैंने भी हैरत में पूछ लिया कि, बाबा मैं कुछ समझा नहीं। बाबा ने पहले तो मेरी बात को टाल दिया और बोले कि कुछ नहीं। फिर हाथ में पकड़ी हुई पूजा की थाली से एक पीले रंग का फूल उठाया और उसमें फूंक कर मुझे दे दिया। मैने भी उसे अपनी जेब में रख लिया। साथ ही उन्होंने यह भी कहाकि जब डर लगे उसके सामने जला देना। मैंने भी उसे लेकर जेब में रख लिया। घर लौटकर मैंने कपड़े बदले और सो गया।
